Tuesday, June 15, 2010

दिमाग रूपी आरी की धार तेज करो,मिलेगी मानसिक शांति

         एक आदमी भरी दोपहरी में आरी से पेड़ की डाल काट रहा था। पसीने से लथपथ उस आदमी को देखकर वहां से गुजरते हुए मैनें उससे पूंछा की भाई क्‍या कर रहे हो तो उसने झल्‍लाकर उत्‍तर दिया दिखाई नहीं दे रहा की मैं पेड़ काट रहा हूं। मैने उससे कहां की य‍दि तुम थोडा आराम कर लो और अपनी आरी की धार को तेज कर लो तो तुम्‍हारे काम में आसानी होगी और जल्‍दी भी हो जाएगा। उसको मेरी बात समझ नहीं आयी और वह फिर झल्‍लाया और अपने काम में लग गया।
        आज के इस आपाधापी के युग में ऐसा ही हो रहा है। लोग मशीन की तरह काम में लगे हैं और वे क्‍या कर रहे हैं। कैसे कर रहे हैं । काम के बारे में उनके पास चितंन का समय ही नहीं है । सुबह होते ही उनकी दिनचर्या मशीन की तरह शुरू हो जाती है और रात में सोने तक चलती है । इसके बाद भी शरीर तो रात को जैसे तैसे सो जाता है पर दिमाग की मशीन बंद ही नहीं होती। आज 95 प्रतिशत लोगों की यह समस्‍या है। वे जिस काम को करते है यदि वे उसके बारे में थोड़ा चिन्‍तन करें और अपने दिमाग रूपी आरी का धार को तेज कर लें तो वे जिस काम को कर रहे है उसमें समय भी कम लगेगा और उन्‍हें मानसिक शांति भी मिलेगी।
      होना यह चाहिए की हमें काम के साथ-साथ चितंन से अपने दिमाग रूपी आरी की धार को तेज करते रहना चाहिए। यदि हम प्रतिदिन चिंतन कर अपने काम के उन हर पहलूओं के बारे में विचार करेंगे तो हमें अपनी ग‍ल्तियां समझ आएगी और हम उनको सुधारनें का प्रयास करेंगे। जिससे हम कम समय में अधिक काम कर सकेंगे। हर समय जुझने का आशय यह नहीं होता है कि हम बहुत काम करते हैं हम बहुत व्‍यस्‍त हैं । हम दुनिया को धोखा दे सकते हैं पर अपने आप को नहीं । हमारे दिन भर किए काम का प‍रिणाम क्‍या निकला यह सबसे महत्‍वपूर्ण तथ्‍य होता है ।
   जिस काम को आप दिन भर से करने का प्रयास कर रहे हों। हो सकता है की यदि आप उसके तकनीकी पहलूओं पर ध्‍यान देते तो शायद वह 1 घंटे में भी हो सकता था। फिर ऐसा भी हो सकता है की वह काम जिसके लिए आप ने दिनभर खपा दिया उसके बारे में आपको बाद में पता लगा की यह व्‍यर्थ था। कई बातें हो सकती है । सबसे अच्‍छी बात यह होना चाहिए की हमें चिंतन करना चाहिए ।आप देखिए की आप यदि प्रतिदिन अपनी कार्यप्रणाली को लेकर चिंतन करते है तो आप की कार्यप्रणाली में जो परिवर्तन आएगा उसकी आप कल्‍पना नहीं कर सकते ।
    मैने अक्‍सर देखा है की कार्यालयों में हर उंचे पद पर बैठे अधिकारियों की आदत होती है की वे अपने से छोटे कर्मचारियों के कामों को भी खुद करने की इक्‍छा रखते है। वे अक्‍सर अपने औहदे का काम भूलकर छोटे- छोटे कामों में अपने आपको ज्‍यादा व्‍यस्‍त रखते है और पूरा दिन उसी में निकाल देते है । यह गलत है जो काम जिस व्‍यक्ति का उसे ही करना चाहिए। आपके मार्गदर्शन से ही काम हो जाना चाहिए ना की आप स्‍वयं फाइलों को निपटाने लगे।
        जब एक भृत्‍य को अवकाश चाहिए होता है तो वह एक पेज पूरा लिखकर लाता है अपनी समस्‍याओं के साथ। जब छोटे अधिकारी को अवकाश चाहिए होता है तो वह लगभग आधा पेज लिखता है। उससे बड़े अधिकारी को अवकाश चाहिए होता है तो वह चार लाइनें लिखता है और जब सबसे बड़े अधिकारी को छुट्टी चाहिए होती है तो वह केवल इशारा करता है और उसका अवकाश स्‍वीकृत हो जाता है ।
          इस बात का आशय यह है कि हम जैसे जैसे बड़े पद पर पहुंचते है वैसे वैसे ही हमारे बोलने और लिखने के शब्‍द कम होते जाते है । यदि हम इन बातों का व्‍यवहारिक जीवन में ध्‍यान रखकर काम करें तो हमें कई समस्‍याओं और मानसिक तनाव से मुक्ति मिल सकती है।




3 comments:

  1. नमस्ते,

    आपका बलोग पढकर अच्चा लगा । आपके चिट्ठों को इंडलि में शामिल करने से अन्य कयी चिट्ठाकारों के सम्पर्क में आने की सम्भावना ज़्यादा हैं । एक बार इंडलि देखने से आपको भी यकीन हो जायेगा ।

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  2. विचारणीय...आभार इन विचारों का.

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