Monday, June 14, 2010

पढ़ने लिखाने से ज्‍यादा जरूरी है सुनना

                    हम अपने आपको और अपने  बच्‍चों को पढ़ना-लिखना सिखाते है,बोलना सिखाते है।यह सब स्‍कूलों में भी सिखाया जाता है। पर हमने कभी यह सोचा की सुनना किस स्‍कूल में सिखाया जाता होगा। हम अच्‍छा पढ़ा लिखा तो लेते है। हम चाहते है की बच्‍चा हमारा अच्‍छा वक्‍ता भी बने। पर हम उससे सुनने की आदत तो सिखाते ही नही है जो सबसे जरूरी होती है । सुनने वाला व्‍यक्ति ही सही निर्णय कर सकता है। हर परिस्थितियों को समझकर विवेक से काम कर सकता है। यह आदत हमारे भीतर होती ही नहीं जिससे हम सामने वाले की बात हो सुनना ही नहीं चाहते और बात शुरू होते ही हम जवाब देने में लग जाते हैं जो सबसे गलत होता है। क्‍योकि हम उसकी बात को समझते ही नहीं और अपनी आत्‍मकथा के साथ  जवाब देने लगते है जिसका प्रभाव अक्‍सर गलत हो जाता है।
                      मुझे एक बात याद आती है कि एक बार एक व्‍यक्ति की आंख से धुंधला दिखाई दे रहा था। वह आंखों के डॉक्‍टर के पास पहुंचा और डॉक्‍टर को अपनी समस्‍या बतायी । डॉक्‍टर ने उसका चश्‍मा उतारा और अपना चश्‍मा उसकी आंखों पर लगा दिया। डॉक्‍टर ने पूंछा कि बताओं अब कैसा दिखता है व्‍यक्ति ने देखा की डॉक्‍टर का चश्‍मा लगाने से उसकी आंखों के सामने और अंधेरा छा गया । उसने डॉक्‍टर से बोला की मुझे कुछ भी स्‍पष्‍ट नहीं दिखायी दे रहा है, इस बात को सुनकर डॉक्‍टर भड़क उठा कि क्‍या बात करते हो  यह चश्‍मा तो मैं इतने सालों से लगा रहा हूं और मुझे साफ दिखायी देता है और तुम कहते हो की तुम्‍हें कुछ दिखायी नहीं दे रहा यह कैसे हो सकता है।अब आप तो गये थे अपनी परेशानी का हल निकालने डॉक्‍टर के पास और डॉक्‍टर ने आपकी परेशानी और बढ़ा दी। ऐसे में यदि भविष्‍य में आपको कोई परेशानी होती है तो क्‍या आप फिर उस डॉक्‍टर के पास जाना पसंद करेंगे। मुझे लगता है कभी नहीं
                      जीवन में अक्‍सर ऐसा होता है कि हम दुसरों की बातों को कभी सुनना नहीं चाहते और यदि वह हमारे पास आता भी है तो हम उसपर अपने नजरिए का चश्‍मा लगाने की कोशिश करने लगते है। यह गलत है। जब हमारे बच्‍चे भी हमसे किसी समस्‍या पर चर्चा करना चाहते है तो हम उनके शब्‍दों को सुनने की बजाय जवाब देने और अपनी आत्‍मकथा उन पर लादने की कोशिश करते है । जिससे बच्‍चा जो मूल समस्‍या आपके सामने रखना चाहता है वह आपके नजरिए के कारण वे आपसे कह नहीं पाता । 
हमें अपने नजरिए को बदला चाहिए और बोलने से ज्‍यादा सुनने की आदत हमें डालना चाहिए । हम बात को सुनने और उसे समझे फिर उसका जवाब दे तो आप देखेंगे की उसके परिणाम सकारात्‍मक निकलेंगे।यह आदत हमें अपने बच्‍चों में अभी से डालना चाहिए की वे इस बात को समझे की जितना पढ़ना- लिखाना और बोलना जरूरी है उससे भी ज्‍यादा जरूरी है सुनना । बातों को सुनना और समझना।जिससे आगे आने वाले समय में वे हर  बात को समझे और उसके बाद जवाब दे ।फिर मुझे नहीं लगता की किसी माता पिता को यह कहना पड़े कि मेरा बेटा मेरी बातों को सुनना ही नहीं चाहता।








Tuesday, June 8, 2010

उतेजना प्रोफेशनल लाइफ में घातक

               जीवन में परिस्थितियां मनुष्‍य के अंदर द्वंद्व उत्‍पन्‍न करती रहती है कई बार मनुष्‍य दूसरों के कहने से उतेजित हो जाता है और कभी अपनी बातों के द्वारा दूसरों को  उतेजित कर देता है । प्रोफेशनल लाइफ में यह दोनों की तरह बाते घातक हो सकती है हमें हमेश इन बातों से बचना चाहिए । ऐसी परिस्थित में मनुष्‍य को स्‍वधर्म का से समस्‍याओं का सुलझाना चाहिए।        
             एक बार एक राजा भ्रमण पर निकला तो उन्‍होंने देखा की एक शेर गाय को भोजन बनाने के लिए आतुर है। गाय राजा की शरण में आ गयी, तो राजा ने शेर से कहां कि यह अब मेरे शरणागत है मैं तुम्‍हे इसे नहीं मारने दूंगा। इस पर शेर बोला हे राजन तुम यहां से चले जाओ ये गाय मेरा भोजन है और इसको मारना मेरा स्‍वधर्म है तुम इसके बीच में मत आओ। राजा बोला में क्षत्रिय राजा हूं मेरा स्‍वधर्म शरणागत की रक्षा करना है। अब तुम बताओं की जब किसी का स्‍वर्धम दूसरे के स्‍वर्धम से टकराता है तब क्‍या करना चाहिए ।इस बात पर राजा बोला की मूर्ख लोग आपस में लड़ने की चेष्‍टा करते है और बुद्धिमान लोग बीच को कोई रास्‍ता निकालते है। अब हमें कुछ इस तरह का रास्‍ता निकालना होगा। इस पर राजा बोला की तुम इस गाय को जाने दो और इसकी जगह तुम मुझे खा कर अपनी भूख शांत कर लो । शेर बोला हे राज शूरवीर हो तुम अतुल धन संपत्ति के स्‍वामी हो तुम क्‍यो इस तुच्‍छ प्राणी के लिए अपने जीवन को दांव पर लगा रहे हो । राजा ने बोला तुम्‍हार स्‍वधर्म है इस गाय को मार कर अपनी भूख का शांत करना और क्षत्रिय का धर्म है रक्षा करना यदि मै ने इस गाय की रक्षा ना की तो मेरे वंश का गौरव खत्‍म हो जाएगा और जिस वंश में राम ,लव कुश,हरीशचंद्र जैसे महापुरूष है वे मेरे इस जीवन को कायर कहेंगे तो ऐसे जीवन से मर जाना अच्‍छा है। राजा ने अपने शरीर को सिंह के समझ समर्पित कर दिया।        
              कहा भी जाता है की भय उससे भय खाता है जिसको भय से भय नहीं खाता । परीक्षा पूर्ण हुई और परीक्षार्थी उत्‍तीर्ण हुआ और परीक्षक हारा। स्‍वधर्म का पालन करने से बड़ी से बड़ी मुश्किलों से छुटकार मिल सकता है। 
मुझे यह बात इस लिए ध्‍यान में आयी क्‍योकि मेरे अजीज मित्र है एक दिन वे मुझे मिले और मुझे आपने एम्‍पलायर से परेशानी के बारे में मुझे बताने लगे । एम्‍पलायर हमेशा शक करता है उसको छोटी छोटी बातों को वे वजह बढ़ाचढ़ा कर करने की आदत है जिससे मेरी हमेशा उससे गिचड़ होती है। मुझे लगा मेरा मित्र वाकये परेशान है। मैं उसकी इस परेशानी को इस लिए भी अच्‍छे से समझ रहा था क्‍योकि अक्‍सर ऐसी परेशानी से हर कोई जुड़ा है जो अपने एम्‍पलायर से संतुष्‍ट नहीं होता है और इस तरह की मानसिक पीड़ा को झेलता रहा है। मुझे उसकी बात सुनकर एक बात याद आयी जो मैने कहीं पड़ी थी।

यदि मेरा मन इस बात को मान ले कि फलां व्‍यक्ति जो कह रहा है
वह सही है तो
सारी समस्‍याओं का सारे विवादों का वही अंत हो जाता है।


       इस बात से मुझे बहुत प्रेरणा मिलती है । मेरे मित्र को मैने यह बात बतायी और उससे कहां की इस का प्रयोग कर देखे।हालांकि वह काफी दिनों से मुझे मिला नहीं पर में उम्‍मीद करता हूं कि वह सलामत होगा।

Monday, June 7, 2010

फांसी की सजा खत्‍म करो

                    सरकार को एक प्रस्‍ताव लाना चाहिए और कानून व्‍यवस्‍था से फांसी की सजा के प्रावधान को बदल देना चाहिए। इस प्रस्‍ताव को पास करने में सरकार को कोई विरोध भी नहीं झेलना पड़ेगा। मुझे लगता है कि यह सबसे ज्‍यादा आम स्‍वीकृति से पास होने वाला प्रस्‍ताव होगा। इस प्रस्‍ताव का एक फायदा यह भी होगा की न्‍याय की आशा लगाये लोगों का न्‍याय पालिका से विश्‍वास नहीं उठेगा। माननीय न्‍यायालयों की इस ना मिलने वाली फांसी की सजा देने से मुक्ति मिल जाएगी। अफजल और कसाब जैसे हाल के ही उदाहरण है जिन्‍हें फांसी की सजा मिलने के बाद भी आज तक यह फैसला नहीं हो पाया की फांसी कब होगी। जिनके परिवार के लोगों को इन्‍होंने निशाना बनाया वे बर्षो तक इस बात का इंतजार ही करते रहेंगे की कब वह दिन आएगा और इन दरिंदों को सूली पर लटकाया जाएगा। पर मुझे तो यह लगाता है कि जो इंतजार कर रहे है वे इस दुनिया से विदा हो जाएगें पर ये दरिंदे यहां जीवित रहेगे और देश के लोगों के पैसों से ऐश करते रहेंगे। राजनेताओं के दफ्तरों में इनकी फाइलें धूल खाती रहेंगी और हम आशा करते रहेंगे की हमारे साथ कभी तो न्‍याय होगा।
       भारत सहनशीलों का देश है । यहां के लोग धैयवान है। इनका सब कुछ लूट भी जाय तो ये उफ नही कर सकते । इसका सबसे बड़ा उदाहरण आज 25 साल बाद भोपाल गैस कांड के फैसले के बाद पीडि़त लोगों चिल्‍ला चिल्‍ला कर कह रहें है।  हम केवल जिन्‍दा है पर हमारी आत्‍मा मर चुकी है।हमे मारो काटो हम कुछ नहीं कहेंगे। हमें मारने वालों को तुम छोड़ तो तो भी हम कुछ नहीं कहेंगे क्‍योकि हम जिन्‍दा है । हम कायर नहीं धैयवान है जिन्‍होंने  हमे हजार बार लूटा है हमारी उन पर आज भी आस्‍था है और हम उन्‍हीं के नेतृत्‍व में लुटते रहेंगे। हम सहनशील है हमारी आखें चली गई तो क्‍या,हमारे बच्‍चे हमेशा के लिए विकलांग हो गये तो क्‍या ,मॉ बाप का साया हमारे से उठ क्‍या तो क्‍या पर हम सहनशील है। उस न्‍याय पालिका में हमे विश्‍वास है जिसमे एक छोटे से न्‍याय के लिए भी 20 साल लग जाते है आरोपी और फरयादी दोनों ही चल बसते है । फिर तो यह 16 हजार लोगों की मौत का मामला है इसमें 200 साल तो लग ही जाएंगे। पर हमारे बच्‍चे उसमें यकिन करते है की देर से सही पर फैसला होगा। आज 25 साल बाद जो फैसला हुआ उससे हम खुश नहीं है पर हमें किसी से शिकवा नहीं है हम आगें 25 साल और लड़ाई लड़ेगे।लड़ो लड़ाई आरोपियों में एक तो मर चुका है बाकी आधे से ज्‍यादा के पैर कब्र में लटके हुए है। अगले 25 साल बाद जब फैसला होगा तब हम उनकी कब्र पर फूल चढ़ाने के लिए जाएगे ।भारत संस्‍कारवानों का देश है मरे आदमियों की आत्‍माओं को दुखी नहीं करता है। जब फूल ही चढ़ाने है तो इस तरह की लड़ाई शुरू ही क्‍यो हुई।16 हजार लोगों की सार्वजनिक मौत और 5 लाख से ज्‍यादा घायलों की श्रेणी में आये लोगों को न्‍याय दिलाने के उन्‍हें 25 साल इंतजार करना पड़ा तब भी सही न्‍याय नहीं मिला । और कितना इंतजार करना होगा।
              


        

Sunday, June 6, 2010

जाति के नाम पर सरकार का छलावा

         आज जाति पर आधारित जनगणना का मुद्दा गरमाया हुआ है।जगह-जगह संगोष्‍ठी हो रहीं हैं। संसद में बहस हो रही है,पार्टी के नेता मीडिया के सामने उछल-उछल के जनता के प्रति अपनी झूठी सदभावना दिखा रहे है। नेता और जनता मंहगाई का मुद्दा भूलकर जाति के मुद्दे पर मंथन में लग गये है। सरकारें कभी आम जनता से यह पूंछती है की वे तुअर की दाल की कीमत 50 रूपये से 100 रूपये करने जा रही है,इस मुददे पर जनता की राय जरूरी है। पेट्रोल,बिजली की कीमत बढ़ा रही है इस पर आम जनता की राय लेने की जरूरत है । कभी नहीं होता सरकार अपना बजट देखती है और कीमतों को बढ़ाती है। तब उसे किसी आम आदमी से राय लेने की जरूरत नहीं लगती ।आज जातिआधार पर जनगणना में सरकार के बजट पर कोई असर नहीं पढ़ने वाला सो इस बेरूखे मुद्दा को जनता के बीच उछाला जा रहा है। राजनेताओं को कितना आसान होता है आम जनता को बेवकूफ बनाना। मंहगाई कितनी भी बढ़ जाए देश में संगोष्‍ठी नहीं होती।संसद में थोडी बहस के बाद 1-2 रूपये कम कर बढ़ी मंहगाई को कम कर दिया जाता है। लोग खुश हो जाते है कि चलो 2 रूपये कम हुए ।
       जाति के आधार पर जनगणना का मुद्दा केवल राजनीति से प्रेरित है। सरकार जनगणना कराती है हर परिवार के 50 प्रकार की जानकारी जनगणना के प्रपत्र में भरी जा रही है। सरकार उसमें जानकारी के साथ लोगों की जाति भरवा रही है ।सरकार जनगणना विभाग से जातियों की जानकारी अलग से भी ले सकती है। इसमें आम लोगों के पास मुद्दा उठाने से क्‍या फायदा। मुझे नहीं लगता की सिर्फ नेताओं के अलावा किसी को भी जाति आधारित जनगणना में कोई रूझान होगा। आम आदमी को जीवन की मूलभूत चीजों की जरूर है वह‍ किसी भी आधारित जनगणना से मिले। आम आदमी  मंहगाई,पेट्रोल और डीजल की बढ़ती कीमतों पर ध्‍यान ना दे । लोगों को ध्‍यान बटाने के लिए राजनीतिक चालबाजी है। सरकार हमेशा कुछ ना कुछ मुद्दा उठाकर लोगों का ध्‍यान उस मुद्दे की ओर खीचने के लिए षड़यंत्र करती रहती है जिससे सरकार को आम आदमी घेरने का प्रयास ना करे।
      आज देश नक्‍सली समस्‍या पर संगोष्‍ठी नहीं होती। अखबार इसके लिए कोई सर्वेक्षण नहीं करता। देश में बढ़ते भ्रष्‍टाचार पर संगोष्‍ठी नहीं की जाती,क्‍योकि इसमें राजनेताओं का हित नहीं होता है। जाति आधारित जनगणना पर संगोष्‍ठी कराने इस मुद्दे को गरमाने में सरकार का भला है।आम लोगा का मूल समस्‍याओं से ध्‍यान हट जाए सरकार की मंशा पूरी हो जाए। मैं तो यह कहता हूं कि  जनगणना का काम ईमानदारी से सरकार करवा ले,चाहे जाति के आधार पर या बिना जाति के आधार पर इससे आम आदमी को कोई फर्क नहीं पड़ना। यदि ये राजनेता हकीकत में देश का भला चाहते है तो इस जनसंख्‍या पर नियत्रंण की कारगर योजना बनाए।देश में जो लोग भुखमरी से मर रहे है उनकी जिंदगी की योजना बनाए। नक्‍सलियों से देश में बेगुनाह जनता मारी जा रही है उसकी योजना बनाए। संसद में बैठकर इन मुददों पर बहस करें तो कुछ देश की जनता का भला हो सकता है। जाति के आधार पर आकड़े होने या ना होने  से कुछ हासिल नहीं होगा । किसी का भला नहीं होना जब तक राजनैतिक इक्‍छाशक्ति इस देश के विकास करने की ना हो ।
इस तरह के मुददो को उठाकर ये सरकारे आम आदमी को छलने के अलावा कोई काम नहीं कर सकती। 

Saturday, June 5, 2010

भविष्‍य होता नहीं बनता है हमारे विचारों से

भविष्‍य क्‍या है मैं इस प्रश्‍न के उत्‍तर के लिए काफी भटकता रहां और अंत में मुझे पता चला की भविष्‍य कुछ नहीं होता। भविष्‍य  लेकर हम अपना और अपने बच्‍चों का वर्तमान खत्‍म कर रहे है। वास्‍तव में भविष्‍य के नाम पर सुखद कल्‍पनाएं होती है जो हम कर सकते है । कल्‍पानाएं ही जीवन का आधार है, नक्‍सा  है । जिन पर हमारे जीवन की इमारत खड़ी है । भविष्‍य में केवल इतना होता है कि हम अपने जीवन का एक नक्‍सा बना लेते है और उस नक्‍से के आधार पर वर्तमान में हमें अपने क्रिया कलापों को अपने विचारों को  इस तरह ढालना होता है की जो जीवन की दीवारें हम बना रहे है वे भविष्‍य की कल्‍पना के आधार पर बने नक्‍से से  मेल खाती हो। इससे यह बात तय होती है कि  जो कुछ भी होता है वह वर्तमान में ही होता है । भविष्‍य में करने के लिए कुछ नहीं होता। पर अक्‍सर होता यह है कि हम हमेशा भविष्‍य को लेकर चिंतित रहते है अपने अपने परिवार के बच्‍चों के भविष्‍य की चिंता में माता पिता सूख कर कांटा हो जाते है । फिर भी वे भविष्‍य सवांरनें की गारंटी नहीं ले पाते। मुझे इस बात में सबसे ज्‍यादा आश्चर्य होता है कि जिस थाली को हमने खाया नहीं हम बिना खाए उस थाली के बारे में कमेंट कैसे कर सकते है । थाली का स्‍वाद अच्‍छा है या खराब यह तो हमें चखने पर ही पता चल पाएगा।
मेरे एक मित्र है वे हमेश अपने बच्‍चों के भविष्‍य के लिए परेशान घूमते रहते है।उनका बच्‍चा 12 वीं की परीक्षा में बैठा वे मुझे मिले तो बडे़ हैरान थे। मैने उनसे पूंछा की भई क्‍या बात है परेशान लग रहे हो तो वे बोले की बच्‍चे ने परीक्षा दी है । रिजल्‍ट क्‍या आता है इस बात को लेकर परेशान हूं । यदि अच्‍छे अंक नहीं आए तो बच्‍चे का क्‍या होगा। हाल में रिजल्‍ट आया उनका बच्‍चा अच्‍छे अंको से पास हुआ मैने उन्‍हें बधाई देने उनके घर पंहुचा तो वे पहले से ज्‍यादा परेशान मिले । मैने पूंछा भई अब तो रिजल्‍ट आ गया बच्‍चा अच्‍छे अंकों से पास होगया अब क्‍यों परेशान हो तो उनका कहना था कि भई अच्‍छे अंक से पास हो गया इसलिए और चिंता बढ़ गई अब आगे क्‍या पढ़ाई कराना है जिसमें भविष्‍य हो इसको लेकर परेशान हूं।
लोग वेबजह ही परेशान है जिस भविष्‍य की इतनी ज्‍यादा चिंता करते है वह होता ही नहीं यह कोई समझना ही नहीं चाहता। केवल  होता है वर्तमान ।हम जो भी करते हैं उसका हमे परिणाम मिलता है,होसकता है कि कुछ का परिणाम देर वे  मिले कुछ का तुरंत,पर सब कुछ वर्तमान में होता है। हम स्‍वयं तो वर्तमान में जीना नहीं चाहते क्‍योकि हमें हकीकत से डर ल गता है। इसलिए अपनी अकर्मण्‍डता के चलते हम अपने परिवार और अपने बच्‍चों को भविष्‍य की कोरी कल्‍पनाओं को  हकीकत बताकर उन्‍हें इस बात के लिए तैयार करते है की हम भविष्‍य को लेकर चिंतित है।वर्तमान में तुम जो भी करों वह हम नहीं देख रहे पर तुम्‍हारे भविष्‍य के प्रति सचेत है । यह क्‍या बात हुई मुझे समझ नहीं आती । हमें भविष्‍य में नहीं वर्तमान में ही जीना सिखना होगा और अपने परिवार को भी वर्तमान में जीने की आदत डालनी होगी। वर्तमान अच्‍छा होगा यथार्थ  के धरातल पर होगा तो भविष्‍य अपने आप ही अच्‍छा हो जाएगा इसकी गारंटी है।
              मेरे एक मित्र जो मेरे साथ काम करते है वे हमेशा डर डर कर काम करते है।मैं उससे अक्‍सर पूंछता हूं कि जब तुम हमेशा सही होते हो तो डर कर काम क्‍यो करते हो तो उसका एक सीधा जबाव होता है की तुम्‍हारे पर तो कई काम है पर मेरे पास विकल्‍प नहीं । यदि मैने जबाव सवाल किया तो मेरी नौकरी चली जाए या ट्रांसर्फर हो गया तो मेरा और परिवार  भविष्‍य क्‍या होगा। इस तरह जीवन से डरना कहां का सही है भविष्‍य कभी नहीं होता। भविष्‍य हमे बनाना होता है और वह बनता है अपने विचारों से हमारे वर्तमान के क्रिया कलापों से यह बात कब लोगों के समझ आएगी और वे वर्तमान में जीना सीखेंगे।










दिमाग से कचड़ा अलग करो

              हम जब किसी से मिलते है तो हमें उससे उस तरह मिलना चाहिए जैसे की वह हमें आज ही मिला हो। उससे हमारी पहली मुलाकात हो । इस तरह से हम सामने वाले पर अपने व्‍यक्तिव की एक ऐसी छाप छोड़ सकते है जिससे वह कभी भूल ही नहीं सकता और वह हमेशा आपको याद रख सकता है। होता यह है कि जब भी हम किसी से बात करने या मिलने के लिए जाते है तो हम उसके दसों साल पुराना इतिहास  के आंकड़े अपने दिमाग में जमा कर ले जाते  है।जैसे ही उस व्‍‍यक्ति से बात करना शुरू होती है तो दिमाग में जमा पुराने आंकड़े हमारे विचारों पर प्रभाव डालना शुरू कर देते है जिससे हमारे व्‍यवहार में बदलाव आ जाता है। हम सहज नहीं हो पाते और कई बार वह व्‍यक्ति की सही बात भी हमे भ्रामक लगने लगती है। यह बात गलत है। होना यह चाहिए कि जब भी हम किसी से मिलने पहुंचे तो उसके पुराने इतिहास का अपने दिमाग से निकाल कर रख दें। हम यह सोचें कि इससे हमारी पहली मुलाकात है और जब किसी से पहली मुलाकात होती है तो यह तय है कि हम उसके प्रति कोई पूर्वाग्रह नहीं पाल सकते । हमारे व्‍यवहार में अपना पन होता है और ताजगी होती है जिससे सामने वाला प्रभा‍वित हुए बिना नहीं रह सकता । यह कहलाती है वालि शक्ति ,इसका हमे अपने दैनिक जीवन में उपयोग करना चाहिए।
                रामायण में वालि को मारने के लिए भगवान श्री राम को भी पेड़ का सहारा लेना पड़ा था । स्‍वयं महाबली भगवान को भी छिप कर वालि का वध करना पड़ा। वालि को वरदान था कि जो भी  व्‍यक्ति उस के सामने आयेगा उसकी आधी शाक्ति उस में चली जाएगी।  भगवान जानते थे कि वालि एक अच्‍छा वानरराज है और यदि इससे मेरी बात हो गयी तो में इसके बातों से मैं प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाउंगा और इसे नहीं मार पाउंगा,इसलिए उन्‍हें भी छिप कर बार करना पड़ा। जब स्‍वयं भगवान अच्‍छे विचार बालों से प्रभावित हो जाते है तो इंसान की क्‍या बिसात।बस उसमें पूर्वाग्रह ना हो।
           मुझे इस बात एहसास आज इतनी गंभीरता से हुआ कि मैं  बिना लिखे रह नहीं सका। मेरे एक बहुत करीबी  है उनकी सबसे अच्‍छी बात यह है कि इस आपाधापी के दौर में वे जैसे 15 साल पहले थे वैसे ही आज है। उनके साथ काम करने वाले लोगों आज पता नहीं कहॉं से कहॉं पहुंच गए ,पर उनके जीवन के प्रति तटस्‍थ भाव ने और अपने काम के प्रति ईमानदारी ने उन्‍हें ज्‍यों का त्‍यों रखा। मैने देखा की उन्‍होंने कभी किसी के प्रति पूर्वाग्रह नहीं पाला । हमेशा सभी के साथ एक से सबंध। आज जब में उनके पास बैठा था तो वे  किसी से बात कर रहें थे तो उनके व्‍यवहार में उस व्‍‍यक्ति के प्रति एक अजीब सा रूखापन था । फोन लगाते ही उनके चहरे पर एक अजीब की कठोरता आ गई। फोन चालू होते ही जो बात करने का लहजा था वह बड़ा बेरूखा था । मुझे उनके इस व्‍यवहार पर आर्श्चय हुआ । पर मुझे लगा कि आज इनके दिमाग पर भी पुराने पर्चो ने  कब्‍जा जमा लिया है और उनके व्‍यवहार को बदल दिया।
         दैनिक जीवन में हमेशा ऐसा ही होता है कि हम अपने दिमाग में इतना कचड़ा जमा कर लेते हैं कि वह  कचड़ा हमारे व्‍यवहार को बदल देता है । यदि हम अपने दिमाग से यह कचड़ा अलग कर दें तो हम उस बच्‍चे की तरह हो जाएगें जो यह कभी नहीं सोचता की फलां व्‍यक्ति अच्‍छा है या बुरा। वह हर किसी को देख कर मुसकरा देता है और सबसे अच्‍छी बात यह होती है कि उसकी मुसकराहट को देखकर बुरा व्‍यक्ति भी हसंने लगा है और उससे प्‍यार करने लगता है।










Wednesday, May 26, 2010

बचपन में खो जाएं

व्‍यक्ति अपने विचारों से अपने आप को लगातार कैद करता है। वह इतनी सीमा रेखाएं स्‍वत: ही बना लेता है। एक समय ऐसा आता है जब वह अपनी विचारों के द्वारा खींचे गए इस जाल में इतना उलझ जाता है की वह चाह कर भी नहीं निकल पाता । उसे हर ओर बंधन ही नजर आते है ।मैने अक्‍सर देखा है कि हम एक दुसरे के प्रति अपने विचारों के द्वारा इतनी दूरियां बना लेते है की जब कभी सहज ही हमारा उसके पास जाना भी होता है तो हम विचारों द्वारा खींची गई रेखाओं को लांघ नहीं पाते । यह सबसे विकराल समस्‍या है हमारे जीवन की। एक छोटा बच्‍चा जिसके पास किसी भी तरह के विचार नहीं होते पर जो भी उसे प्‍यार से बुलाए चला जाता है ना उसे कोई भय होता है ना कोई सीमा। वह हर किसी को प्रेम के दृष्टि कोंण से देखता है । यह बात हमें उस बचपन से सीखना चाहिए।
मेरा बालक तेजस्‍व अभी दो साल का है। मै उसकी शरारतें देखता हूं तो मेरे अंदर एक अजीब सा भाव पैदा होता है मैं इस बात को सोचने पर मजबूर हो जाता हूं की यह आज इस भोलापन आगें चल कर इस आपाधापी के युग में मैं उसका बचपन कैसे बचा संकू । मेरा मन भावुक हो उठता है जब मैं उसकी छोटी छोटी शरारतें जिन्‍हें वह अंजाने में करता है पर होती बहुत सुंदर है।ये छोटी छोटी शरारतें समय के साथ अपनी सुंदरता खो देती है ।मैं सोचता हू कि कैसे उसकी ये छोटी छोटी शरारतें हमेश सुंदर बनी रहें। इस समय उसका हर किसी से मिलना,मुस्‍कराना सभी का उसको प्‍यार करना देखकर मेरी आखों  भर जाती है । मै फिर भी सोचता हूं कि क्‍या इसका ऐसे ही हर किसी से मिलना,मुस्‍कराना और सभी का प्‍यार करना हमेश बरकरार रख सकूंगा।
मुझे लगता है कि बचपन कभी खत्‍म नहीं होना चा‍हिए। बचपन के खत्‍म होती ही सारी समस्‍याएं शुरू हो जाती है हमें बहुत से काम इसी बचपन की तरह अंजाने में करना चाहिए जिसमें कोई छल नहीं होता।किसी के प्रति दुरभावन नहीं होता । कितना अच्‍छा हो कि हम सभी बचपन में चले जाए और उसी निश्‍छलता के साथ अपने कामों को अंजाम दे तो ये दुनिया कितनी सुंदर होजाए। ये आपसी लड़ाई झगड़े,एक दुसरे के प्रति  धृर्णा खत्‍म हो जाए और यह ईश्‍वर की रचना सार्थक हो जाए।
मुझे पता है कि यह संभव करना आसान नहीं है पर एक विचार को अपने मन में हम स्‍थापित तो कर सकते है।